न्यायपालिका, चुनाव आयोग और मीडिया के नाम एक खुला पत्र--नीमच आशा सांभर


नीमच आशा सांभर विचार किसी राजनीतिक दल, विचारधारा या व्यक्ति के पक्ष अथवा विपक्ष में नहीं, बल्कि उस भारत के पक्ष में लिख रही हूँ जिसकी नींव संविधान, लोकतंत्र और संस्थाओं की स्वतंत्रता पर रखी गई थी।
आज देश के करोड़ों नागरिकों के मन में एक पीड़ा, एक बेचैनी और एक प्रश्न है। वह प्रश्न यह है कि क्या हमारी संवैधानिक संस्थाएँ वास्तव में उतनी ही स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं, जितनी उन्हें होना चाहिए?
जब जनता यह महसूस करने लगे कि सत्ता को जवाब देह बनाने वाली संस्थाएँ सत्ता के साथ खड़ी दिखाई दे रही हैं, तब लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट शुरू होता है।
आपके और सत्ता के बीच वास्तविकता चाहे जो भी हो, लेकिन यह धारणा बनना ही लोकतंत्र के लिए घातक है। क्योंकि लोकतंत्र केवल निष्पक्ष होने से नहीं चलता, बल्कि निष्पक्ष दिखाई देने से भी चलता है।
आपको सरकार के किसी निर्णय, किसी पद, किसी सम्मान या किसी लाभ के बदले चाहे जितना प्रतिफल मिल रहा हो, लेकिन वह इस देश के सम्मान, स्वाभिमान और भविष्य से बड़ा नहीं हो सकता।
यदि आपको किसी राजनीतिक दल का समर्थन करना ही है, तो कम से कम न्यायपालिका, चुनाव आयोग और स्वतंत्र मीडिया का चोला पहनकर मत कीजिए। लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व लेकर लोकतंत्र को कमजोर करना सबसे बड़ा नैतिक अपराध है।
आज का छोटा सा लोभ, आज का छोटा सा समझौता और आज की छोटी सी चुप्पी केवल देश को ही नहीं, आपके अपने घरों को भी खोखला कर रही है। आपकी आने वाली पीढ़ियाँ भी उस विरासत का बोझ उठाएँगी जो आप आज उनके लिए छोड़ रहे हैं।
कुछ क्षण रुककर याद कीजिए-
 वह स्वतंत्रता संग्राम, जिसमें लाखों लोगों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
* वह बलिदान, जिसके कारण यह तिरंगा आज स्वतंत्र आकाश में लहरा रहा है।
* वह संविधान, जिसे बनाने में वर्षों का संघर्ष, चिंतन और त्याग लगा।
* वह लोकतंत्र, जिसे स्थापित करने के लिए असंख्य लोगों ने जेलें भरीं, गोलियाँ खाईं और अपने प्राण तक दे दिए।
क्या यह सब केवल इसलिए था कि आने वाली पीढ़ियाँ कुछ पदों, कुछ सुविधाओं और कुछ क्षणिक लाभों के लिए उन मूल्यों को तिलांजलि दे दें?- क्या आपको देश के भीतर बढ़ती बेचैनी नहीं दिखती?
- क्या आपको संस्थाओं पर घटता विश्वास नहीं दिखता?
- क्या आपको वह निराशा नहीं दिखती जो तब पैदा होती है जब नागरिकों को लगता है कि उनकी अंतिम उम्मीद भी निष्पक्ष नहीं रही?
जब लोकतंत्र कमजोर होता है, तब सबसे अधिक नुकसान किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का होता है।
*इतिहास बहुत निर्मम होता है। वह पद नहीं याद रखता, वह वेतन नहीं याद रखता, वह पुरस्कार नहीं याद रखता। इतिहास केवल यह याद रखता है कि संकट की घड़ी में कौन संविधान के साथ खड़ा था और कौन सत्ता के साथ।*
मेरी आप सबसे हाथ जोड़कर विनती है-*
- एक बार राजनीति से ऊपर उठकर भारत के बारे में सोचिए।
- उस मिट्टी के बारे में सोचिए, जहाँ आप पैदा हुए, पले-बढ़े और जिसने आपको पहचान दी।
- अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के बारे में सोचिए।
- संविधान के प्रति अपनी शपथ को याद कीजिए।
- लोकतंत्र के प्रति अपने दायित्व को याद कीजिए।
और स्वयं से एक प्रश्न पूछिए-*
क्या हम आने वाली पीढ़ियों को एक मजबूत लोकतंत्र सौंप रहे हैं, या सुविधाओं और समझौतों के बदले उसकी नींव कमजोर कर रहे हैं?
*देश किसी भी सरकार से बड़ा है।*संविधान किसी भी दल से बड़ा है।*
*और भारत की आत्मा किसी भी सत्ता से कहीं अधिक महान है।इसपर विचार करे सोचे समझे हम क्या कर रहे है

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