नई दिल्ली/भरतपुर |ये वही निशान हैं जो बताते हैं कि हम रुके नहीं..." – यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि उन 125 राष्ट्रभक्त युवाओं के अटूट संकल्प की कहानी है, जिन्होंने भरतपुर से देश की राजधानी दिल्ली तक का 800 किलोमीटर का सफर साइकिल से पूरा किया। रास्ते की कठिनाइयों, शारीरिक चोटों और ठोकरों को मात देकर, यह अनूठी 'साइकिल तिरंगा यात्रा' अपने गंतव्य, ऐतिहासिक लाल किले पर सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
'हर गाँव की मिट्टी' से लाल किले का तिलक
इस यात्रा का सबसे भावुक और महत्वपूर्ण क्षण तब आया जब भारतपुरा से दिल्ली तक के सफर के दौरान विभिन्न गाँवों से एकत्रित की गई पवित्र मिट्टी से लाल किले की प्राचीर के समक्ष तिलक किया गया। यह प्रतीक था कि यह यात्रा केवल दूरी तय करने के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की माटी को नमन करने और 'राष्ट्र सर्वोपरि' के भाव को जगाने के लिए थी।
मुश्किलों पर भारी पड़ा राष्ट्रप्रेम
यात्रा के दौरान प्रतिभागियों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ऊबड़-खाबड़ रास्ते और थकान के कारण कई युवाओं को चोटें भी आईं। लेकिन, देशभक्ति के जज्बे के आगे यह दर्द बौना साबित हुआ। चोट के निशानों को युवाओं ने अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी दृढ़ता का पदक माना। जैसा कि मुख्य चित्र में दिखाया गया है, खून के धब्बों और चोटों के बावजूद युवाओं के चेहरों पर मुस्कान और आँखों में तिरंगा फहराने की चमक बरकरार रही।
'पाँच संकल्प' के साथ राष्ट्र सेवा
यह यात्रा केवल एक शारीरिक प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक गहरा सामाजिक और नैतिक उद्देश्य भी था। यात्रा के दौरान युवाओं ने देश के सामने 'पाँच संकल्प' प्रस्तुत किए, जिन्हें वे अपने जीवन में उतारने और समाज में फैलाने का कार्य करेंगे:
सेवा (निःस्वार्थ भाव से समाज की मदद)
स्वच्छता (अपने पर्यावरण और देश को साफ रखना)
शिक्षा (ज्ञान का प्रसार और साक्षरता)
एकता (अखंड भारत और भाईचारे की भावना)
स्वास्थ्य (एक स्वस्थ और मजबूत राष्ट्र का निर्माण)
लाल किले पर गूँजा 'भारत माता की जय'
23 अगस्त 2026 की शाम, तय समय के अनुसार, लाल किले के 'ज्ञान पथ' पर इन 125 राष्ट्रभक्तों का हुजूम उमड़ पड़ा। सुरक्षा बलों (ASI/CISF) के निर्देशों का पालन करते हुए, पूर्ण अनुशासन और गर्व के साथ यात्रा को विराम दिया गया। भगवान श्री राम की प्रतिमा के आशीर्वाद और हवा में लहराते सैकड़ों तिरंगों के बीच, लाल किले की फिजा 'भारत माता की जय' के नारों से गूँज उठी।
आयोजकों ने इस अवसर पर कहा, "हमने जो कहा, वो करके दिखाया! चोटें लगीं, सफर मुश्किल था, लेकिन हमारा संकल्प हिमालय से भी ऊँचा था। दुनिया ने देखा कि जब युवाओं को राष्ट्रभक्ति का रंग लगता है, तो कोई भी बाधा उन्हें रोक नहीं सकती।